Gajendra Moksha Stotram IN Devnagari । गजेन्द्र माेक्ष हिन्दी भाषा टीका – PDF

Gajendra Moksha PDF

Gajendra Moksha Stotram (गजेन्द्र मोक्ष)

गजेन्द्र मोक्ष स्तोत्रम् संस्कृत में एक प्रसिद्ध स्तोत्र है जो श्री विष्णु भगवान की कृपा का वर्णन करता है।

Language: Sanskrit (देवनागरी)
Publisher: anskritpustakalaya.com
Year of Publication: 2024
File Size: 192 KB
Total Pages: 5
Author: Srimad Bhagwat
Editor: Devraj Sharma
Printer: Not Mentioned
Place of Printing: Nepal
Source: Sanskrit Books

यह स्तोत्र गजेन्द्र के श्रीहरि विष्णु से की गई करुण पुकार का वर्णन करता है। यह भक्त और भगवान के बीच की शरणागति और कृपा की अद्भुत कथा है।

स्तुति हिन्दी मे

मैं उस परमेश्वर को नमस्कार करता हूँ जो साक्षात् चेतन स्वरूप हैं, समस्त जगत् के मूल कारण हैं, पुरुष रूप हैं, तथा सर्वोच्च हैं।

जिनके कारण यह सारा संसार प्रकट हुआ है, जो स्वयं इस सब में व्याप्त हैं, जो इन सबसे परे हैं — मैं उस स्वयंभू भगवान की शरण लेता हूँ।

जो अपनी माया से यह जगत प्रकट करते हैं और छिपाते भी हैं, वह परमात्मा मेरे हृदय की रक्षा करें।

समस्त सृष्टि, देवता, रक्षक और कारण जिनका अंततः लय हो जाते हैं, उस अंधकार के पार विराजमान प्रभु की मैं स्तुति करता हूँ।

जिनका स्वरूप देवता और ऋषि भी नहीं जानते, जो साक्षात् नाटक करने वाले कलाकार की तरह जगत को संचालन करते हैं, ऐसे प्रभु मेरी रक्षा करें।

जिनके दर्शन के लिए तपस्वी, साधु और मुनि सभी संसार त्याग कर वनों में भटकते हैं — वे ही मेरी गति हैं।

जिनका कोई नाम, रूप, जन्म या कर्म नहीं है, फिर भी जो माया से सृष्टि करते हैं — उन्हें बारम्बार नमस्कार है।

जो ब्रह्मरूप हैं, अनन्त शक्ति से युक्त हैं, जिनका कोई रूप नहीं फिर भी सभी रूप उन्हीं से उत्पन्न हैं — मैं उन्हें प्रणाम करता हूँ।

जो आत्मस्वरूप, साक्षी और परमात्मा हैं, जिन तक मन और वाणी नहीं पहुँच सकते — उन्हें नमस्कार है।

जो केवल सात्त्विकता से प्राप्त होते हैं, और मुक्त आत्माओं द्वारा हृदय में अनुभूत होते हैं — वे परम सुखस्वरूप प्रभु हैं।

जो शांत, उग्र, अज्ञेय और निर्गुण हैं, उन्हें प्रणाम है। वे ज्ञान के घनस्वरूप हैं।

जो क्षेत्रज्ञ, साक्षी और समस्त कारणों के मूल पुरुष हैं — उन्हें नमस्कार है।

जो इन्द्रियों के गुणों के ज्ञाता, असत्य के छाया के रूप जानने वाले, सत्यस्वरूप हैं — उन्हें प्रणाम है।

जो समस्त कारणों के कारण, बिना कारण के कारण, और अद्भुत कारण हैं — उन्हें नमस्कार है।

जो माया से आवृत्त चैतन्य हैं, फिर भी स्वयं प्रकाशित हैं — उन्हें बारम्बार प्रणाम है।

जो करुणा से पाश से बँधे जीवों को मुक्त करते हैं, जो परमात्मा हैं — उन्हें प्रणाम है।

जो आत्मा, पुत्र, धन, और गृह में आसक्त लोगों से अप्राप्त हैं, लेकिन मुक्तात्माओं के हृदय में निवास करते हैं — उन्हें प्रणाम है।

जो धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष चाहने वालों को फल देते हैं, और शरीर भी प्रदान करते हैं — मुझे भी मोक्ष प्रदान करें।

जो भक्त किसी भी सांसारिक इच्छा से मुक्त होकर केवल उनके गुणों का कीर्तन करते हुए आनंद में मग्न रहते हैं — वे ही मेरे परम लक्ष्य हैं।

जो अक्षर, ब्रह्म, परमेश्वर, और अव्यक्त हैं, वे मेरी वंदना के पात्र हैं।

जिनसे ब्रह्मा, वेद, देवता और लोक उत्पन्न हुए हैं, वे प्रभु मेरी वंदना करें।

जैसे अग्नि से अनेक ज्वालाएँ निकलती हैं, वैसे ही उनसे यह सम्पूर्ण गुणसमूह, बुद्धि, मन और शरीर प्रकट हुए हैं।

जो न देवता हैं, न राक्षस, न मनुष्य, न स्त्री, न पुरुष, न कोई विशेष गुण या कर्म — वे ही सर्वशक्तिमान हैं।

मुझे इस संसार में जीने की इच्छा नहीं, मैं केवल उस प्रभु का मोक्ष चाहता हूँ जो काल के प्रभाव से अछूते हैं।

मैं उस अजन्मा, सर्वव्यापक, विश्वात्मा परमेश्वर को नमन करता हूँ, जो सम्पूर्ण जगत के मूल कारण हैं।

जो योगियों के ध्यान में प्रकट होते हैं, ऐसे योगेश्वर को मैं प्रणाम करता हूँ।

जिनकी शक्ति अनियंत्रित है, जो इन्द्रियों से परे हैं, लेकिन सबका आधार हैं — उन्हें नमस्कार है।

जो स्वयं को भी अपनी शक्ति से छिपा देते हैं, और जिनका प्रभाव अत्यन्त रहस्यमय है — मैं उन्हें नमस्कार करता हूँ।

यह गजेन्द्र द्वारा रचित भगवान का स्तोत्र सम्पूर्ण हुआ।

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